बिनु सत्संग विवेक न होई

सत् अर्थात सुन्दर । संग अर्थात संगति । अर्थात अच्छे लोगों का साथ करना । गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा है बिना सत्संग के बुद्धि प्रखर नहीं होती । सत्संग अर्थात अच्छे लोगों की संगति करना । शुद्ध लोगों की संगति करना । सात्विक लोगों की संगति करना । सत्संग से मानसिकता शुद्ध हो जातीपढ़ना जारी रखें "बिनु सत्संग विवेक न होई"

प्रार्थना की परिभाषा

नमस्कार! प्रार्थना अर्थात निवेदन । किसी श्रेष्ठ के सम्मुख प्रस्तुत होकर अपने यथोचित कल्याण हेतु आर्त भाव से निवेदन करना ही प्रार्थना होती है । कभी भी निवेदन केवल योग्य के सन्मुख ही करना चाहिए अन्यथा असफलता ही प्राप्त होती है । इस सृष्टि का अपितु पूरे ब्रम्हांड के लिए प्रार्थना का एक ही स्थानपढ़ना जारी रखें "प्रार्थना की परिभाषा"

पतन & उत्थान ?

नमस्कार! आज मनुष्य अपने कर्मों के कारण पतन को प्राप्त कर रहा है । पतन अर्थात निकृष्ट कर्म के प्रतिफल । जो कर्म धर्म के अनुकूल ना हो, समाज के अनुकूल ना हो, वह निकृष्ट कर्म होता है । अनैतिक कर्म होता है । और उस अनैतिक कर्म का जो परिणाम होता है वह पतनपढ़ना जारी रखें "पतन & उत्थान ?"

निंदा नही करनी चाहिए

नमस्कार! आज का समाज पर निंदा पर जितना समय बर्बाद करता है यदि वह परहित में वही समय दे तो कोई दुःखी नही होगा । आज हम यही विचार करते रह जाते हैं कि वह व्यक्ति कैसा है । उसमे क्या- क्या अवगुण है । उस यह नहीं करना चाहिए। उसे वह नहीं करना चाहिएपढ़ना जारी रखें "निंदा नही करनी चाहिए"

“समस्याएं” सब के साथ होती हैं !

समस्या सब के साथ होती है । विश्व के अधिकांश मनुष्यों के साथ बहुत सी समस्या होती है । जैसे शारीरिक , मानसिक , आर्थिक , सामाजिक , भौतिक आदि । ऐसी स्थिति में सभी यही चाहते हैं कि समस्या का समाधान हो । परंतु मनोनुकूल समाधान त्वरित संभव हो ऐसा होना मुश्किल होता हैपढ़ना जारी रखें "“समस्याएं” सब के साथ होती हैं !"

और पास कैसे आए ?

एक राजा था । वह अत्यधिक व्यस्त रहता था। फिर भी वह अपनी प्रजा के प्रति बहुत ही तत्पर रहता था । वह प्रयास करता था कि अपनी प्रजा की कोई भी ऐसी समस्या ना हो जिससे कि उसकी प्रजा को दुख अथवा समस्या की प्राप्ति हो । वह प्रयास करता था की प्रजा सेपढ़ना जारी रखें "और पास कैसे आए ?"

पिता ?

पिता शब्द स्वयं में एक स्तम्भ है, आधार है, एक ऐसी नींव है जिसका नाम आते ही संतान के मनोबल में पूर्णरूपेण प्रबलता आती हैं । पिता अपनी संतान की एक ऐसी अपेक्षा होती है, जिस पर संतान को गर्व होता है । संतान पिता के मार्ग पर चलने का प्रयत्न करता है। या ऐसापढ़ना जारी रखें "पिता ?"

दोषारोपण

किसी को दोष देना मूर्खता है । मेरे पास अपने खुद की सीमाओं को ही पार करने की मुसीबत काफी है और हमें इस बात पर सिर नहीं पीटना चाहिए कि ईश्वर ने बुद्धि का उपहार सबको एक जैसा नहीं दिया है । हमसे ढेरों गलतियां होती हैं तब भी जा कर के हम शायदपढ़ना जारी रखें "दोषारोपण"

क्या “जातिवाद” पतन का कारण ?

नमस्कार मित्रों! आज हम जातिवाद भेदभाव पर विचार करेंगे । जाति का किसी भी प्रकार से हमारे प्राचीन सभ्यता में कहीं कोई औचित्य नहीं रहा है । जाति का यदि विचार किया जाए तो जाति हम-आपने कुछ समय से बनाया हुआ है और उसी के आधार पर भेदभाव भी किया जाता है । हां! वर्णपढ़ना जारी रखें "क्या “जातिवाद” पतन का कारण ?"

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